सोमवार, 15 जनवरी 2018

शरद कोकास की लम्बी कविता 'देह' पर राजेश जोशी की चिठ्ठी



इस दुनिया में जो कुछ भी घटता है ,वह इस देह पर ही घटता है .

इस केन्द्रीय विचार के साथ रची गई है लम्बी कविता 'देह' जो प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका 'पहल' के अंक 104 में प्रकाशित हुई थी . इस कविता को पंद्रह भागों में विभक्त कर मैंने अपने ब्लॉग के पाठकों के लिए उसके ऑडियो तैयार किया हैं . आज की इस पोस्ट में इस कविता पर प्रतिक्रिया स्वरूप सुप्रसिद्ध कवि राजेश जोशी की चिठ्ठी के साथ ऑडियो का एक छोटा सा अंश प्रस्तुत कर रहा हूँ . शेष ऑडियो अगली पोस्ट में ....


राजेश जोशी की चिठ्ठी

प्रिय शरद ,


बहुत दिन बाद तुम्हारी लम्बी कविता 'देह' को पढ़ा है । हालांकि एक पाठ कविता के लिये और खासतोर से लम्बी कविता के लिये नाकाफ़ी है । गहन आवेगात्मक लय के साथ चलती यह एक महत्वपूर्ण कविता है । इसमें देह की विकासगाथा भी है और देह के इतिहास का आख्यान भी । एक साथ कई स्तरों पर चलती कविता की कई परतें हैं । पृथ्वी सहित अनेक ग्रहों की देह के आकार लेने की गाथा से शुरू कविता धरती पर जीवन के आकार लेने की गाथा में प्रवेश करती है और अमीबा के निराकार से आकार तक की यात्रा की तरफ जाती है । कहना न होगा कि तुम एक साथ विज्ञान इतिहास ,दर्शन और क्लासिकल साहित्य की स्मृतियों को एक दूसरे से बहुत खूबसूरती से गूंथ देते हो। यह रास्ते बड़ी कविता की ओर जाते हैं । इसमें किस तरह हमारे पुरखों की कई बार हमारे विस्मृत पुरखों की परछाइयाँ उनकी सन्ततियों तक जाती हैं इसका भी बहुत खूबसूरती से तुमने इस्तेमाल किया है । यह सच है कि मनुष्य की देह सचमुच एक पहेली है । जितना उसे ज़्यादा से ज़्यादा जानने की कोशिश होती रही है उतनी ही वह अबूझ भी बनी ही रहती है ।


"एक देह की जिम्मेदारी में शामिल  होती हैं / अन्य देहों की ज़रूरतें ।"

यह एक महत्वपूर्ण विचार भी है और पंक्ति भी । तुम इतिहास में मनुष्य देह के साथ किये गये अनेक अत्याचारों की स्मृतियों के साथ ही तात्कालिक इतिहास की यूनीयन कार्बाइड नरोड़ा पाटिया आदि को भी समेट लेते हो । इस तरह एक बड़ा वृत्त यह कविता बनाती है । इसमें उन भविष्यवाणियों की ओर भी संकेत है जो खतरों की तरह मंडरा रही हैं । देह के मशीनों में बदलने के प्रयास का भी जिक्र यहाँ है । कहना न होगा कि बिना एक सही और प्रगतिशील विचारधारा के इतना बड़ा वृत्त खींचना और उनके बीच के सम्बंधों के महीन तागों को छूना संभव नहीं था । उपलब्धि खतरे और भयावह सच्चाइयों के साथ कहीं लगता है कि एक बड़े स्वप्न को भी इसमें जगह मिलनी चाहिये थी । लेकिन एक महागाथा की तरह यह कविता बहुत सारे मनों को बेचैन करेगी ।
  
शुभकामनाओं के साथ

तुम्हारा
राजेश जोशी
भोपाल ,14.10.16    

इस ऑडियो और राजेश जी की चिठ्ठी पर आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी . पूरी कविता आप साइड बार में दिए गये लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं . धन्यवाद.  

आपका 

शरद कोकास 

शनिवार, 19 अगस्त 2017

रचना संवाद-5 -रचना में सन्दर्भों की आवश्यकता और उपयोगिता

साहित्य में 'मजनू' आ जाये तो क्या होगा 


किसी भी रचना में खास तौर पर कविता में ऐतिहासिक या माइथोलॉजीकल सन्दर्भों की अधिकता की वज़ह से उसे तत्काल समझने में व्यवधान उत्पन्न होता है यह हमारे अध्ययन और जानकारी पर निर्भर करता है कि हम उस सन्दर्भ को कितना समझ सकते हैं सामान्यतः हम अपने बचपन से कुछ ऐतिहासिक और माइथोलॉजीकल सन्दर्भों को जानते हैं जिनकी शिक्षा हमें शाला और महाविद्यालय में मिलती है दादी नानी की कहानियों में भी हमने बहुत सी बातें सुनी होती हैं इसके बाद हम अपनी रूचि  से बहुत कुछ पढ़ते हैं । इस तरह हमारे मस्तिष्क में बचपन से अपनी इन्द्रियों के माध्यम से प्राप्त किया हुआ ज्ञान का खजाना होता है । जिन लोगों की स्कूली शिक्षा नहीं होती वे भी अपने समाज द्वारा प्राप्त ज्ञान से अपने आप को अपडेट करते रहते हैं ।

यदि किसी कविता को पढ़ते हुए हमें कोई माइथोलॉजीकल सन्दर्भ प्राप्त होता है तो हम तत्काल उसका अर्थ समझ जाते हैं । हिंदी के अनेक मुहावरे इन्ही सन्दर्भों को लेकर बने हैं ।जैसे हमें लिखना है “वह गहरी नींद में सो रहा था” तो हम लिखेंगे “वह कुम्भकर्ण की तरह सो रहा था” अब हमें रामायण के सन्दर्भ से यह याद है की कुम्भकर्ण गहरी नींद सोता था । “द्रौपदी की साड़ी” शब्द पढ़ते ही हमें द्रौपदी चीरहरण की कथा याद आ जाती है , एकलव्य का नाम पढ़ते ही हमें उसके साथ हुआ छल याद आ जाता है । वर्तमान सन्दर्भों में भी देखें तो 'निर्भया' शब्द सुनते या पढ़ते ही हमें पूरी घटना का स्मरण हो जाता है ।

उसी तरह हर सभ्यता के अपने मुहावरे होते हैं जो हमें ज्ञात नहीं होते। अब अगर किसी कविता में “एकिलिस की एड़ी” शब्द आता है तो हम इस ग्रीक पात्र को नहीं पहचानते इसलिए इसका अर्थ समझ नही पाएंगे । एकिलिस दुर्योधन की तरह एक पात्र था जिसकी माँ ने उसे एड़ी से पकड़कर स्टिक नदी में डुबाया था जिससे उसका पूरा शरीर वज्र की तरह बन गया था केवल एड़ी बची रही सो उसकी मृत्यु एड़ी में तीर लगने की वज़ह से हुई । इसलिए योरोप की कहावत में मर्मस्थल को ‘एकिलिस की एड़ी’ कहा जाता है  । लेकिन हमें इसके लिए ग्रीक माइथोलॉजी का ज्ञान होना अनिवार्य है

कविता सांस्कृतिक आदान –प्रदान का माध्यम होती है अब हिंदी की कविता में यदि कुम्भकर्ण शब्द आता है तो रामायण से अनभिग्य होने के कारण योरोप के लोग इसका अर्थ समझ नहीं पाएंगे लेकिन इस आधार पर वे इसे कविता कहने से ख़ारिज तो नहीं कर देंगे
योरोप की बात छोड़ भी दें तो हमारे देश में इतनी सारी घटनाएँ घट चुकी हैं जिनके बारे में हमें पता ही नहीं है अगर कविता में उन घटनाओं का सन्दर्भ आता है तो हम उन्हें न जान पाने की वज़ह से उनका आस्वाद ग्रहण नहीं कर सकेंगे ।

कविता में कवि बहुत कम शब्दों का प्रयोग करता है और घटनाओं को बिम्बों प्रतीकों और सन्दर्भों में ही व्यक्त करता है । कविता का अर्थ लेख नहीं होता अतः उसे विस्तार से देने की आवश्यकता भी नहीं है । यहाँ कवि की विवशता नहीं है । यह हमारे मस्तिष्क की सीमा है । हमारे अवचेतन में जो सन्दर्भ और बिम्ब हैं हम उन्ही के माध्यम से कविता को समझने की कोशिश करते हैं और उससे आगे जानने की कोशिश भी नहीं करते । यह कठिनाई न केवल हिंदी की बल्कि अन्य भाषाओँ की कविता समझने में भी आती है । उर्दू की अनेक नज़्म और गज़लें ऐसी हैं जिनमे उर्दू के शब्द और इस्लामिक माइथोलॉजीकल शब्दों का प्रयोग होता है ,जैसे फ़रिश्ते , नोहा की नाव , आदि हम कविता का आनंद लेने के लिए इनका अर्थ ढूँढते हैं या नहीं ? जगजीत सिंह की गाई एक प्रसिद्ध गज़ल है “ बाज़ीचाए अत्फाल है दुनिया मेरे आगे , होता है शबो रोज़ तमाशा मेरे आगे “ अब हम इस ग़ज़ल को समझाने के लिए उर्दू का शब्द कोश देखते हैं या नहीं । उसी तरह बांगला या पंजाबी की कविता में अनेक शब्द ऐसे होते हैं जिनका हिंदी में अनुवाद करते समय भी सन्दर्भों को जस का तस रखा जाता है । हम किसी न किसी माध्यम से उनका अर्थ जानने की कोशिश भी करते ही हैं

इसी तरह हिंदी की कविता में कई स्थानीय शब्द और स्थानीय संदर्भ भी होते हैं लैला मजनू की कहानी सबको पता है लेकिन अमी गूजर और सस्सी पुन्नू की कहानी कितनों को पता है ? तो कविता में अगर यह सन्दर्भ आयेंगे तो हमें उनकी तलाश तो करनी ही पड़ेगी । फिर केवल सन्दर्भों की बात ही नहीं है कविता में ऐसे अनेक शब्द होते हैं जिनका अर्थ हमें नहीं मालूम होता तब हम उनका अर्थ जानने के लिए शब्द कोश देखते हैं या नहीं । हिंदी हमारी भाषा है और हम उसे निरंतर समृद्ध करते रहते हैं उस समय हम उन क्लिष्ट शब्दों को नकारते तो नहीं ,अगर नकारेंगे तो यह भाषा का अपमान होगा । एक साधारण व्यक्ति भले ही भाषा का ऐसा अपमान कर सकता है लेकिन एक रचनाकार के लिए तो यह अक्षम्य होगा ।

आज हमारे पास संचार के इतने माध्यम हैं , तमाम पुस्तकें हैं , शब्दकोष हैं , इंटरनेट है , गूगल सर्च के माध्यम से हम किसी भी भाषा में वह शब्द टाइप कर उसका अर्थ और तमाम सन्दर्भ जान सकते हैं । एक साधारण पाठक भी यह कर सकता है और इसके लिए बहुत ज़्यादा प्रयास करने की जरुरत नहीं है । एक बार यदि हम उस सन्दर्भ का अर्थ भली भांति समझ लेंगे तो फिर आगे हमें कठिनाई नहीं जायेगी । और यह इतना कठिन भी नहीं है । आज से दो सौ  या तीन सौ साल पहले हिंदी में अंग्रेजी का या योरोप की अन्य भाषाओं का कोई शब्द नहीं था,उससे पांच सौ साल पहले उर्दू ,फारसी का कोई शब्द नहीं होता था ,मुहावरों और कहावतों की तो बात ही दूर लेकिन जैसे जैसे हमारा वैश्विक स्तर पर विकास होता जा रहा है विश्व की अनेक भाषाओँ के और वहां घटित होने वाली घटनाओं के सन्दर्भ हमारे साहित्य में बढ़ते जा रहे हैं । टेक्नोलोजी में जब नए शब्द आते हैं तो हम उन्हें किस तरह आत्मसात कर लेते हैं डाटा ,केबल, सॉफ्ट वेयर , यदि यह शब्द कविता में आते हैं तो क्या हम इन्हें अस्वीकार कर देते हैं ? सो हमें साहित्य का आनंद लेने के लिए और वैश्विक स्तर पर अपने साहित्य को स्थापित करने के लिए उन सबको आत्मसात करना ही होगा बल्कि अपनी कविता में उनका प्रयोग भी करना होगा । हमारी इस संकुचित मानसिकता का खामियाज़ा हम भुगत चुके हैं । आज वैश्विक स्तर पर हिंदी की कविता को वह स्थान प्राप्त नहीं है जो उसे मिलना चाहिए था । हम तमाम विदेशी अनुदित साहित्य पढ़ते हैं और सोचते हैं हमारे यहाँ ऐसा साहित्य क्यों नहीं रचा जा रहा । इसके पीछे सबसे  बड़ा कारण हमारी कूप मंडूकता ही है सो हमें इससे उबरना आवश्यक है ।

आपका
शरद कोकास 

शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

रचना संवाद -4 रचना में बिम्ब व प्रतीकों का प्रयोग

रचना संवाद-चार-शरद कोकास 

कई दिनों तक चूल्हा रोया चक्की रही उदास 

 पत्थर जैसा दिल , फूल सा चेहरा, ताड सा लम्बा  जाने कितने ही बिम्बों का इस्तेमाल हम करते हैं । लेकिन ऐसा होता है कि हम कई बिम्बों का प्रयोग अनायास ही कर जाते हैं । केवल रचना में ही नहीं बल्कि सामान्य बोलचाल में भी हम अनेक बिम्बों का प्रयोग करते हैं । सामान्यत: जिन प्रतीकों का हम इस्तेमाल करते हैं उनके रूप व गुणों को ध्यान में रखकर हम उन प्रतीकों को प्रयोग में लाते हैं । इस प्रकार वे तमाम वस्तुएँ जो हमारी चेतना के केन्द्र में होती हैं हम अपनी रचना में ले आते हैं ।

इस बात पर आपने अवश्य ध्यान दिया होगा कि पहले की कविताओं में अलंकारों का प्रयोग अधिक होता था और आजकल बिम्बों एवं प्रतीकों का । इसका कारण यही है कि आज के कवि अपने अनुभव संसार को सजीव रूप में अपनी कविता में व्यक्त करना चाहते हैं । ऐसा नहीं कि यह पहले नहीं होता था लेकिन इस वजह से आज  की समकालीन कविता जन के अधिक निकट है ।इस तरह कविता के सौंदर्यशास्त्र में भी परिवर्तन हुआ है ।

इस प्रकार हम कविता में अपनी देखी भाली वस्तुओं का बिम्ब के रूप में उपयोग करते हैं । यह सारे अनुभव हम अपनी इन्द्रियों से प्राप्त करते हैं हिन्दी साहित्य की बात करें या  वैश्विक साहित्य की प्रारम्भिक दौर की रचनायें बिम्बों और अलंकारों के आधिक्य से भरी होती थीं । रचनाओं में अधिकाधिक बिम्बों और अलंकारों का होना ही उसकी श्रेष्ठता का प्रतीक माना जाता था । फिर धीरे धीरे यह प्रयोग कम होने लगा उसका कारण यही था कि जिस यथार्थ का रचना में चित्रण होता था उसके लिए बिम्ब नाकाफ़ी होते थे ।

प्रश्न यह है कि कविता में बिम्बों और प्रतीकों का प्रयोग क्यों आवश्यक है ? वस्तुत: बिम्ब और प्रतीक हमें अपनी बात सरलता से और चिर परिचित ढंग से कहने में सहायक होते हैं । यह कविता को अनावश्यक वर्णनात्मकता से बचाते हैं । पाठक पूर्व से ही उस बिम्ब के आंतरिक गुण से परिचित होते है इसलिए वे उन बिम्बों के मध्य से कही जा रही बात को सरलता से आत्मसात कर लेते हैं । बिम्ब काव्यात्मकता का विशेष गुण है इसके अभाव में कविता नीरस गद्य की तरह प्रतीत हो सकती है । इसके अलावा बिम्ब कविता को सजीव बनाते हैं ,जीवन के विभिन्न आयामों को हम बिम्बों के मध्य से सटीक ढंग से प्रस्तुत कर सकते हैं । साहित्य की भाषा में बिम्ब अनेक प्रकार के बताये गए हैं जिनमे दृश्य , श्रव्य ,स्वाद ,घ्राण , स्पर्श आदि प्रमुख हैं ,ऐंद्रिकता इनका केन्द्रीय भाव है ।  

जिस तरह रचना के स्त्रोत होते हैं उसी तरह बिम्बों के स्त्रोत भी होते हैं हम प्रकृति से भी अपनी रचनाओं के लिये बहुत से बिम्ब  लेते हैं । प्रकृति मनुष्य और अन्य सभी प्राणियों पर एक सी कृपा करती है और कभी कभी क्रोध भी । प्रकृति और मनुष्य का यह द्वंद्व सदा से जारी है यह संसार बहुत सुन्दर है । हम अपने प्राकृतिक परिवेश में नित्य कुछ न कुछ घटित होता हुआ देखते हैं .लेकिन प्राकृतिक परिघटनाओं को हम ज्यों का त्यों रचना में नहीं लेते हैं । एक ही बिम्ब को हम अनेक तरह से इस्तेमाल कर सकते हैं । कभी बादल और बरखा हमें सुख के प्रतीक लगते हैं तो कभी यह बदली ‘नीर भरी दुख की बदली’ हो जाती है । सामान्य मौसम में जो हवा हमे अच्छी लगती है गर्मियों मे लू के रूप में और सर्दियों में चुभने लगती है । बारिश जो हमें लुभाती है बाढ़ के समय अपना वीभत्स रूप प्रस्तुत करती है , सो कविता में इनका इस्तेमाल इसी तरह होना चाहिए

बिम्ब और प्रतीकों में बहुत सूक्ष्म अंतर होता है । बिम्ब अपने रूप में  तात्कालिक संवेदना  प्रस्तुत करते हैं और कवि जो कहना चाहता है उसे बिम्ब के माध्यम से स्पष्ट कर देते हैं किन्तु प्रतीक अपने अर्थ में और अधिक विस्तृत अर्थ लिए होते हैं अर्थात वे केवल स्थूल प्रतीक नहीं होते बल्कि उसके माध्यम से कवि के विचार और कविता के उद्देश्य को प्रकट करते हैं । प्रतीक के रूप में इस्तेमाल की जाने वाली वस्तु अपने मूल अर्थ के अलावा अन्य वस्तु को भी व्यंजना के रूप में प्रकट करती है । प्रतीक अक्सर एक सम्पूर्ण अवधारणा के लिए भी उपयोग में लाये जाते हैं ।

किसी भी रचना को लिखते समय यह बिम्ब हमारे मानस में होते हैं और हम इनका इस्तेमाल करते हैं ।
हमारे आसपास बहुत कुछ घटित होता रहता है । अकसर देखा गया है कि किसी घटना के घटते ही उसपर रचनाओं की बाढ़ आ जाती है । प्राकतिक विपदाओं को लेकर भी रचना की जाती है लेकिन जो हम अपनी आँखों से देख रहे हैं उसे जस का तस यदि रचना में उतार दें तो वह केवल वर्णनात्मक रचना हो जायेगी और पाठक पर अपना स्थायी प्रभाव नहीं छोड़ेगी । यहाँ मैं बाबा नागार्जुन की एक कविता उद्धृत करना चाहता हूँ जो उन्होने अकाल पर लिखी है ।

“ कई दिनो तक चूल्हा रोया चक्की रही उदास / कई दिनो तक कानी कुतिया सोई उसके पास / कई दिनो तक लगी भीत पर छिपकलियों की गश्त / कई दिनो तक चूहों की भी हालत रही शिकस्त /”

यह प्रसिद्ध कविता आपने पढ़ी ही होगी । यह सारे ब्योरे हमारे जाने पहचाने हैं लेकिन कवि ने अकाल का नाम लिए बिना उसका दृश्य प्रस्तुत करते हुए उनका अलग तरह से इस्तेमाल किया है इस तरह रचनाकार का रचना में उनका सही तरीके से प्रयोग ही मायने रखता है ।

चलिए आपको अपने जीवन की एक घटना बताता हूँ बहुत पहले की बात है ,उन दिनों मैं बैचलर था और होटल में खाना खाया करता था एक कविता लिखते हुए मुझे ‘जीवन के अंतिम समय’  को लेकर कोई बिम्ब नहीं सूझ रहा था ,ऐसा लग रहा था सारे बिम्ब इस्तेमाल किये जा चुके हैं और लिखने को अब कुछ नहीं बचा है , लिखते लिखते देर हो गई रात के करीब 11 बज चुके थे अचानक ख्याल आया कि होटल बन्द हो जाएगा तो रात भर भूखे रहना पड़ेगा सो कविता लिखना बन्द कर बिल्लू सरदार के पंजाब ढाबे पर पहुँच गया

ढाबा बन्द होने का समय हो गया था फिर भी वहां के नौकर ने मुझे खाना परोस दिया , शायद अंडा भुर्जी और तंदूरी रोटी देखा तो रोटी पर राख लगी हुई थी मैंने उससे पूछा तो उसने मासूमियत से जवाब दिया साब जब तंदूर ठंडा होने लगता है तो रोटी पर राख जमने लगती है

मैं कमरे पर लौटकर आया , कविता की कॉपी निकाली और लिखना शुरू किया ..

“ जीवन के ठंडे होते हुए तन्दूर में
सिंकती हुई रोटी पर
हावी होने लगती है
स्वर्ग पाने की अतृप्त इच्छा
राख की शक्ल में

उदर और दिमाग़ के बीच में
त्रिशंकु बनकर
उलटी लटक रही होती है
मोक्ष की अवधारणा “

बस मुझे बिम्ब मिल गया ..
तो इस तरह बिम्ब हमारे आसपास बिखरे होते हैं , उन्हें हमें ढूँढना होता है अब इससे अधिक जानना चाहते हैं तो आपको पूरा बिम्ब विधान पढ़ना होगा , प्रकृति बिम्ब , नाद बिम्ब , गंध बिम्ब , दृश्यबिम्ब आदि सो वह ख़ुद ढूंढकर पढ़ें आज के लिए बस इतना ही , शेष बातचीत करते हुए

 आपका – शरद कोकास 

शनिवार, 22 जुलाई 2017

रचना संवाद - 3- रचना और रचनाकार की मन:स्थिति व अन्तःप्रेरणा


लिखते समय हमारी मनस्थिति कैसी होनी चाहिए 

कई बार ऐसा होता है कि हम कुछ भी लिखने की मन:स्थिति में नहीं होते । विचार हमारे इर्द-गिर्द मँडराते रहते हैं, भाव हमे घेरे रहते हैं लेकिन शब्द नहीं सूझते । कई बार ऐसा भी होता है लिखने लायक तमाम परिस्थितियाँ उपस्थित रहती हैं और एक पंक्ति भी लिखी नहीं जाती । फिर कई बार इसके विपरीत भी होता है । वस्तुत: यह सब कुछ हमारी मन:स्थिति पर निर्भर नहीं करता है । अन्य कई परिस्थितियां भी होती हैं कई बार हम इतना सोच लेते हैं कि मन ही मन रचना बुन डालते हैं लेकिन वह कागज़ पर नहीं आ पाती । कभी कभी कोई पंक्ति बार बार मन में आती है लेकिन हमें ऐसा नहीं लगता कि वह रचना हो सकती है । अक्सर रचनाकार कहते हुए पाये जाते हैं कि बहुत दिनों से कुछ लिखा नहीं या आजकल लिखने का मन नहीं करता । ऐसा क्यों होता है ? हम आज इसका विश्लेषण करेंगे

दरअसल इसका कोई सीधा या बना बनाया उत्तर नहीं है । मेरी लम्बी कविता पुरातत्ववेत्ता जब मैने लिखने की शुरुआत की तब इस बात का तनिक भी खयाल नहीं था कि यह रचना इतनी लम्बी जायेगी । वह विचार भी अचानक ही प्रस्फुटित हुआ । उन दिनो मै बैंक में नौकरी करता था । बीच की छुट्टी में बाहर निकला तो अचानक कुछ पंक्तियाँ कुलबुलाने लगीं । न उस वक्त मेरे पास कागज़ था न कलम । मैने पान की दुकान वाले से कागज़ व कलम माँगा तो उसने एक सिगरेट का रैपर पकड़ा दिया और उस पर मैने सबसे पहले यह पंक्तियाँ लिखीं “ वे श्रुतियों पर इतिहास नहीं रचते / वे आस्थाओं पर इतिहास नहीं रचते / इतिहास में शामिल होने की ज़िद भी उनमें नहीं है । इसके बाद वह कविता धीरे धीरे बढ़ती गई और इतनी बढ़ी कि पन्द्रह सौ पन्क्तियों के बाद ही समाप्त हुई । ज्ञानरंजन जी ने जब इसे ‘पहल ‘ के लिए स्वीकृत किया था तब यह रचना मात्र 20 पेज की थी लेकिन उसके बाद भी विचार आते गए और 33 पेज मैंने और लिखे तात्पर्य यह कि विचार कब कागज़ पर आ जायेगा पता नहीं । कई बार ऐसा भी होता है कि हम कोई और कविता लिख रहे होते हैं और उसी बीच कोई नई कविता जन्म  ले लेती है । पहले की कविता धरी की धरी रह जाती है ।

मुक्तिबोध की प्रसिद्ध पंक्तियाँ है –

विचार आते हैं

लिखते समय नहीं
पत्थर ढोते वक़्त
पीठ पर उठाते वक़्त बोझ
साँप मारते समय पिछवाड़े
बच्चों की नेकर फचीटते वक़्त

कई बार ऐसा भी होता है कि हम कोई अच्छी कविता पढ़ लेते हैं तो हमारी लिखने की मन:स्थिति बन जाती है । भगवत रावत सर कहते थे कि आप दस अच्छी कवितायेँ पढो तो एक कविता आपके भीतर भी जन्म ले सकती है ऐसा इसलिये होता है कि उस रचना को पढ़ते हुए हम कहीं न कहीं रचनाकार के अनुभव संसार से गुजरते हैं । और हमारे सामने एक ऐसा संसार होता है जो हमारे संसार से कहीं न कहीं मिलता है यही हमें एक रचना के लिये प्रेरित करता है । इसीलिये हर रचनाकार के लिये पढ़ना आवश्यक माना गया है । कई बार हम अन्य भाषाओं में लिखा साहित्य पढ़ते है अथवा उसका अनुवाद करते हैं यह अनुवाद भी हमें कई बार लिखने के लिये प्रेरित करता है ।यह भी ज़रूरी नहीं कि कविता लिखने के लिए हम केवल कविता ही पढ़ें , विज्ञान और भौतिकशास्त्र और गणित पढ़ते हुए भी कविता का जन्म हो सकता है

रचनाकार की मनस्थिति पर अपनी रचनाप्रक्रिया को लेकर बहुत सारे लेखकों ने अनेक बातें लिखी हैं प्रसिद्ध लेखक ओरहान पामुक नें “ *मैं क्यों लिखता हूँ ?* ” इस प्रश्न का उत्तर देते हुए रचना की मनस्थिति पर बहुत सारे बयान दिये हैं । आईये देखते है ओरहान पामुक  “मैं क्यों लिखता हूँ “ के उत्तर में क्या लिखते हैं

मैं लिखता हूँ क्योकि लिखना मेरी एक आन्तरिक आवश्यकता है |
मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं वे सारे साधारण कामकाज नहीं कर सकता जो अन्य दूसरे लोग कर सकते हैं |
मैं लिखता हूँ क्योंकि  मैं आप सबसे नाराज हूँ हर एक से नाराज़ हूँ |
मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं इसी तरह वास्तविक जीवन में बदलाव लाने में अपनी हिस्सेदारी कर सकता हूँ |
मैं लिखता हूँ क्योंकि मुझे कागज कलम और स्याही की गन्ध पसंद है |
मैं लिखता हूँ क्योंकि  अन्य किसी भी चीज़ से ज़्यादा मुझे साहित्य पर विश्वास है |
मैं लिखता हूँ क्योंकि यह एक आदत है,एक जुनून है |
मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं विस्मृत किये जाने से डरता हूँ ।
मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं उस यश और अभिरुचि को चाहता हूँ जो लिखने से मिलती है। मैं अकेला होने के लिये लिखता हूँ ।
           

मैं लिखता हूँ क्योंकि मुझे आशा है कि शायद इस तरह से मैं समझ सकूँगा कि मै आप सबसे,हर एक से ,बहुत,बहुत ज़्यादा नाराज क्यों हूँ ।
मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं चाहता हूँ कि लोग मुझे पढें ।
मैं लिखता हूँ क्योंकि जब एक बार कुछ लिखना शुरु कर देता हूँ तो उसे पूरा कर देना चाहता हूँ ।
मैं लिखता हूँ क्योंकि हर कोई मुझसे लिखने की अपेक्षा करता है ।
मैं लिखता हूँ क्योंकि मुझे पुस्तकालयों की अमरता मे एक नादान सा विश्वास है और मेरी उन पुस्तकों में जो आलमारी में रखी हुई हैं ।
मैं लिखता हूँ क्योंकि जीवन की सुन्दरताओं और वैभव को शब्दों में रूपायित करना एक उत्तेजक अनुभव है ।
मैं लिखता हूँ क्योंकि मैं कभी खुश नहीं रह सका ,मैं खुश होने के लिये लिखता हूँ ।

इस तरह अनेक लोग हैं जिन्हे रचना के लिये एक विशेष मन:स्थिति की आवश्यकता होती है । कुछ लोग किसी विशेष तरह के कागज़ पर विशेष स्याही से लिखते हैं । कुछ लोग कागज़ पर लिखने की बजाय सीधे कम्प्यूटर पर लिखते हैं । कुछ लोग चाय या सिगरेट के बगैर नहीं लिख सकते । कुछ लोग दुख में नहीं लिख सकते तो कुछ लोग सुख में नहीं लिख सकते  । कुछ लोगों को लिखने के लिये भीड़ की ज़रूरत होती है तो कुछ लोग एकांत पसन्द करते हैं । कुछ लोग केवल दिन के उजाले में लिख सकते हैं तो किसी को लिखने के लिए रात्रि की निस्तब्धता की आवश्यकता होती है

मित्रों मेरी राय यह है कि जो सच्चा और ईमानदार लेखक होता है उसे लिखने के लिए किसी  बहाने की ज़रूरत नहीं होती ।लेखन का सीधा सम्बन्ध आपके अवचेतन की स्थिति से है इसलिए कि लिखने की समस्त सामग्री आपके अवचेतन में ही उपस्थित होती है इसलिए अपने अवचेतन को साधना ही सबसे ज्यादा ज़रूरी होता है । बाक़ी सब भौतिक स्थितियां और परिस्थितियां होती हैं । हालाँकि उनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती लेकिन उसे साधा तो जा ही सकता है शायद इसीलिए मनीषियों ने लेखन को साधना भी कहा है । भौतिक परिस्थितियों की बात पर मुझे सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की प्रसिद्ध कविता याद आती है

अगर तुम्हारे घर के एक कमरे में लाश पड़ी हो
तो क्या तुम गा सकते हो
अगर तुम्हारे घर के किसी कमरे में आग लगी हो
तो क्या तुम प्रार्थना कर सकते हो   
  
वस्तुतः लेखन सिर्फ भौतिक परिस्थिति या मनस्थिति से ही संभव नहीं है ,यह दोनों आपकी संवेदना को किस तरह झकझोरती हैं यह इस पर निर्भर करता है आप किस मनस्थिति में लिखते हैं और लिखने के लिए आपको कौनसी बात प्रेरित करती है यह तो आप ही बताएँगे  

आपका – शरद कोकास


  
 

   

रविवार, 25 सितंबर 2016

रचना संवाद - 2 जीवनानुभव को रचनानुभव में बदलने की कीमियागरी

हमें अनुभव कहाँ कहाँ से मिलते हैं 

दिन -प्रतिदिन के अनुभव- अनुभव शब्द से हम सभी वाकिफ हैं जीवन में हमें अनेक अनुभव होते हैं । हम सुबह जागते हैं तो हमे सूर्य उगता दिखाई देता है । हम रोज़मर्रा के कामों की शुरुआत करते हैं । हमें उस दिन की रोटी का प्रबन्ध करना होता है और उसके लिये घर से बाहर निकलना  होता है । अपनी नौकरी अपने रोज़गार में प्रतिदिन हमारी कितने ही लोगों से मुलाकात होती है । हम किताबें पढ़ते हैं और दूसरों के अनुभवों को भी जानते हैं । हम यात्राएं करते हैं ,लोगों से मिलते हैं , राजनीतिक घटनाक्रम पर नज़र रखते हैं , लोगों के सुख दुःख में शामिल होते हैं इस तरह रोज़ जाने कितने अनुभवों से समृद्ध होते हैं ।


बचपन से प्राप्त अनुभव : हर नया लेखक चाहे किसी भी विषय को लेकर लिखने की शुरुआत करे उसमे उसके बचपन के अनुभव शामिल होते हैं । इसका कारण यही है कि हमारे अवचेतन में सबसे अधिक बचपन के ही चित्र रहते हैं । चलना, बोलना, लिखना - पढ़ना सीखने के अलावा बचपन में और अपने अध्ययन के दौरान हम बहुत कुछ सीखते हैं । हर लेखक अपनी जैविक इच्छाओं ,भय निद्रा मैथुन , आहार के अलावा बाकी सब इस समाज से ही सीखता है । इस तरह हम अपने अनुभवों को अपने मस्तिष्क में दर्ज करते चले जाते हैं । हमारे लेखन में अवचेतन में स्थापित यह अनुभव वर्तमान अनुभवों और अध्ययन के साथ मिलकर रचना में शामिल हो जाते हैं ।

प्रेम कविता से शुरुआत  : कुछ छोटे-मोटे विषयों के अलावा बहुत से लोग अपने लेखन की शुरुआत प्रेम कविताओं से करते हैं । एक संवेदनशील युवा के मन में प्रेम का जन्म लेना स्वाभाविक है । मनुष्य की जैविक इच्छाएं और प्रेम सम्बन्धी उसकी मानसिक आवश्यकता इन तत्वों को जन्म देती हैं इसलिए उसकी प्रारम्भिक रचनायें प्रेम पर ही होती हैं । धीरे धीरे यह प्रेम विश्व के प्रति प्रेम या मानवता के प्रति प्रेम में परिवर्तित होता है । यह कहा भी जाता है कि जो  प्रेम की अच्छी कविता नहीं लिख सकता वह क्रांति की कविता भी नहीं लिख सकता ।यद्यपि बहुत सारे लोगों ने प्रेम कविता से अपने लेखन की शुरुआत नहीं की होगी विश्व के अनेक देशों के लेखकों ने जहाँ उनका बचपन अराजकता भरे माहौल में बीता बहुत गंभीर रचनाओं से शुरुआत की इसलिए कि उनके जीवन के प्रारंभिक अनुभव दुःख से भरे रहे फिर भी प्रेम उनके जीवन में कहीं न कहीं शामिल रहा जो उनकी परवर्ती रचनाओं में आया । हम पाब्लो नेरुदा जैसे कवि को इस श्रेणी में रख सकते हैं

हम अनुभव कैसे प्राप्त करते हैं इस पर भी कुछ बात कर ली जाये । अनुभव दो तरीके से प्राप्त किये जा सकते हैं स्वयं के द्वारा और अन्य माध्यमो से  । यह तय है कि अपनी इन्द्रियों के माध्यम से स्वयं के द्वारा प्राप्त अनुभव सर्वश्रेष्ठ होते हैं और उनका रचना में रूपांतरण निस्सन्देह अच्छा होता है । लेकिन आज के समय में मीडिया और अन्य माध्यमों के द्वारा हम अन्य व्यक्तियों के अनुभव को भी जस का तस ग्रहण कर सकते हैं और उनके अनुभवों पर विश्वास करते हैं । फिर भी सुनी हुई बातों के अलावा अन्य के अनुभवों की सच्चाई और उनकी तीव्रता को परखने की आवश्यकता होती है और केवल सुनी सुनाई बातों पर लिखना सन्दिग्ध हो सकता है । प्रत्यक्ष अनुभव पर भी लिखना सरल नहीं होता क्योंकि उनमें हमारी मान्यताओं में समाज की मान्यतायें भी शामिल हो जाती हैं और ज़रूरी नहीं कि वे शत प्रतिशत सही हों । इसलिये रचनाकार को अन्य माध्यम से भी उसकी पुष्टि करनी होती है अन्यथा रचना में तथ्यात्मक भूलों की सम्भावना बढ़ जाती है ।अधिकांश अनुभव हम सीधे प्राप्त करते हैं । यह अनुभव सर्वाधिक प्रामणिक होता है ।अनुभव को हम अपने अवचेतन में किस तरह दर्ज करते हैं यह अनुभव की तीव्रता पर भी निर्भर होता है । इसके लिये मुख्यत: हमारी संवेदन क्षमता ज़िम्मेदार है । यह क्षमता जितनी अधिक होगी अनुभव को हम उतनी ही तीव्रता से ग्रहण  कर सकेंगे ।

यहाँ हम वर्तमान में चल रहे स्त्री विमर्श और दलित विमर्श के सन्दर्भ में देखें । ऐसा  माना जाता है कि जो अनुभव स्वयं के द्वारा प्राप्त नहीं हैं उन्हें रचना में बेहतर तरीके से प्रस्तुत नहीं किया जा सकता और वह रचना प्रामाणिक नहीं मानी जा सकती । गैर दलितों द्वारा दलितों पर लिखे साहित्य को इसीलिये नकार दिया गया क्योंकि उसमे वह भोगा हुआ यथार्थ नहीं था । साहित्य में यह बहस अब तक चल रही है । उसी तरह हम स्त्री के सन्दर्भ में भी कह सकते हैं । स्त्री की सामजिक स्थिति एक सार्वजनिक अनुभव हो सकती है लेकिन स्त्री के शरीर में होने वाले हार्मोनल परिवर्तन और फलस्वरूप उपजी मन:स्थिति को कोई पुरुष समझ ही नहीं सकता । स्त्री के द्वारा किये जा रहे ऑब्ज़रवेशंस और उसकी दृष्टि तक ठीक ठीक पहुँच पाना भी पुरुष के लिये असंभव है इसलिये स्त्री द्वारा स्त्री पर रचा साहित्य उसके अनुभव के अधिक करीब होता है । स्त्री या पुरुष लेखक भले ही कह ले कि रचना को जन्म  देने की पीड़ा प्रसव वेदना जैसी होती है लेकिन वास्तविकता सभी जानते हैं कि प्रसव वेदना को बगैर उसके अनुभव के  नहीं जाना जा  सकता  ।

स्वार्जित अनुभव और लेखन यह एक लम्बी बहस का विषय है  प्रश्न यह है कि यदि हम उस वर्ग से नहीं आये हैं तो क्या हम उस वर्ग पर रचना न करें ? यहाँ मैं वरिष्ठ कवि भगवत रावत के कथन को उद्ध्रत करना चाहूँगा  । वे कहते हैं “  मैं ब्राह्मण हूँ । पूरी तरह से आयडेंटीफिकेशन करने के बाद भी समाज ने मुझे ब्राह्मण के नाते स्वीकृति व संस्कार दे रखे हैं । क्या मैं उस वर्ग का आयडेंटिफिकेशन कर सकता हूँ ? डायरेक्ट अनुभव अधिक प्रामाणिक हैं । इसमें बहस की गुंजाइश नहीं है। रचनाकर्म के नाते हम मेहदूद हैं । हमारे अनुभव फंडामेंटल राइट हैं । आधार पर टिककर अन्य घटनाओं के बारे में पढ़कर सुनकर देखकर रियेक्ट करते हैं । नीग्रो के बारे मे हम किताब लिखते हैं , यहाँ हमारा अनुभव सोर्स का नहीं है, अत: हम रचना न करें यह ठीक नहीं है । व्रहत्तर समाज के प्रति सम्वेदना की विश्वदृष्टि से  हम आन्दोलित होते हैं । ये अनुभवों के दो रूप हमारे सामने हैं । जब तक हमारे पास डायरेक्ट अनुभव है , हम किसी दूसरे के अनुभव तक नहीं पहुंच सकते। बहुत से अनुभव अनकांशसली ग्रहण करते हैं । दूसरे रचनाकारों को पढ़ने तथा विश्वदृष्टि विकसित करने से हम नीग्रो के अनुभवों  तक भी पहुंच सकते हैं - करीब करीब । 

इसलिये कहा जा सकता है कि अन्य व्यक्तियों के जीवनानुभव  को भी बेहतर तरीके से रचना में अभिव्यक्त किया जा सकता है इसलिये कि वर्तमान में वैश्विक परिवेश के अंतर्गत कुछ मुद्दे ऐसे हैं जिन पर सार्वजनिन दृष्टि निर्मित हो चुकी है जैसे कि आतंकवाद । इस पर रचना लिखने के लिये आवश्यक नहीं कि हम उसके शिकार हों । उसी तरह दंगे पर कविता लिखने के लिये भी अपना घर जलाना ज़रूरी नहीं है ।

अनुभव को रचना में बदलने की शक्ति क्या दैवीय शक्ति है -  अब हम अपने व्यक्तिगत अनुभवों को रचनानुभव में बदलने के बारे में कुछ बातें विस्तार से देखेंगे ।वरिष्ठ कथाकार  रमाकांत श्रीवास्तव ने एक रचना शिविर मे अपने व्याख्यान में गोर्की के एक लेख का उल्लेख किया था  । इस लेख में मक्सिम गोर्की ने एक लड़की  के बारे में बताया है  जिसने उन्हे पत्र में लिखा था कि मै पन्द्रह वर्ष की हूँ ,परंतु इस अल्पायु में ही मुझ में लेखन की प्रतिभा जागृत हो उठी है ,जिसका कारण मेरा दारुण नीरस जीवन है । रमाकांत जी कहते हैं “  नीरस जीवन को कल्पना से सुन्दर बनाने के प्रयास को भी लिखने का आधार स्वीकार करते हुए गोर्की ने प्रश्न उठाया है , कैसे जीवन की इन स्थितियों में आदमी किसी चीज़ के बारे में लिख सकता है ? लेखन के सम्बन्ध में अनुभव एक बुनियादी प्रश्न है । क्योंकि यही रचना के भावी स्वरूप को तय करने वाला तत्व है । कोई यह भी कह सकता है कि अनुभूतियों का दबाव मुझे बाध्य कर रहा है कि मैं लिखूँ । यह बात भी बुरी नहीं है बल्कि तर्कसम्मत है । कम से कम ये दोनो ही स्थितियाँ समझ मे आनेवाली हैं । किसी  हीनता की ग्रंथि से रचना जन्म लेती है या अचानक किसी भाव के विस्फोट से पैदा होती है । इन फिकरों से ये मानसिक दशायें फिर भी बेहतर हैं । रचनानुभूति कोई दैवी वरदान है यह भ्रम केवल मध्ययुग तक कायम नहीं रहा । निकट अतीत तक रूमानी कलाकारों को यह लगता था  कि उनका स्वर किसी दैवी शक्ति का माध्यम भर है । कोई अपनी पीड़ा को कोई अपने प्यार को अपनी रचना की प्रेरणा मानने पर आमादा रहा ।  भले ही हम इसे दैवी शक्ति माने या लेखन की प्रतिभा को जन्मजात माने लिखने की प्रेरणा हमें अपने अनुभवों की वज़ह से ही मिलती है । जीवनानुभव को रचनानुभव में बदलने की शक्ति हमें हमारे प्रयास से ही मिलती है वर्ना दुनिया में करोड़ों लोग हैं जिनके पास एक लेखक से ज़्यादा अनुभव होते हैं लेकिन वे रचनाकार नहीं हो सकते ।

केवल अनुभव पर्याप्त नहीं - इस तरह हम देखते हैं कि मनुष्य की निजी अनुभूति उसकी रचना में सहायक बन सकती है । वह अपने अनुभवों को रचना में रूपांतरित कर सकता है । लेकिन ख़तरा यह है कि केवल इस तरह से लिखी रचना में रूमानी भावुकता हो सकती है और कालांतर में महत्वहीन साबित हो सकती है  अतः रचना की सार्थकता ज़रूरी है । मैं पुन: रमाकांत जी को उद्ध्रत करना चाहूंगा । “ 
जीवनानुभव को रचना में रूपांतरित करने के लिये सबसे महत्वपूर्ण है रचनाकार की दृष्टि । रचनाकार के पास एक सांस्कृतिक व ऐतिहासिक चेतना होती है ,वह अपनी इसी चेतना का उपयोग रचना में करता है । यह दृष्टि भी उसे जन्म से नहीं प्राप्त होती ,वह यह दृष्टि अर्जित करता है । जब यह दृष्टि उसकी प्रवृत्ति बन जाती है तब वह उसे अपनी रचना को एक विशेष आकार देती है । इसे हम कई बार विचारधारा का नाम भी देते हैं । लेकिन यह जस का तस कविता में नहीं आता हम अपने विचार की रोशनी में चीज़ों को देखते हैं और तदनुसार उसे अपनी रचना में उतारते हैं । जैसे कि हर कारीगर समाज से संसाधन जुटाता है लेकिन उसे उसी रूप में वापस नहीं करता । जैसे कुम्हार समाज से मिट्टी लेता है लेकिन उसका मटका बना कर वापस करता है । टोकरी बुनने वाला प्रकृति से बाँस लेता है और उसकी विभिन्न वस्तुएँ बनाता है । हम आज की आधुनिक वस्तुओं को भी देखे तो उनका मूल कहीं न कहीं प्रकृति में ही है । ठीक इसी तरह रचना के साथ भी होता है ,हम समाज से अनुभव के रूप में जो कुछ भी लेते हैं उसे रचना के रूप में लौटाते हैं । ऐसा हर दौर में हुआ है कि उस काल का जीवन उस काल की रचनाओं में आया है ।  


शरद कोकास  

रविवार, 19 जून 2016

रचना संवाद-1 रचना की स्त्रोत सामग्री

🔲 विचार श्रृंखला :   रचना संवाद🔲

1⃣ हम रचना के लिये कच्चा माल कहाँ से लेते हैं ?

❇ उत्पाद - रचना को यदि हम एक उत्पाद मान लें तो यह बात समझना बहुत आसान हो जायेगा । जिस तरह एक उत्पाद को तैयार करने के लिए हमें कच्चे माल की आवश्यकता  होती है उसी तरह एक रचना को तैयार करने के लिए हमें बहुत  सारी सामग्री की आवश्यकता होती है । हमारा समाज . समाज की भाषा , हमारे अनुभव , स्मृतियाँ और पुस्तकें मुख्यतः रचना की स्त्रोत सामग्री होते हैं । हम अपनी रचना के निर्माण के लिये जो कुछ भी इस दुनिया से लेते है उसे कुछ अलग अलग खानों में बाँटा जा सकता है ।

✳ समाज - सबसे पहले हम अपनी रचनात्मकता के लिये इस समाज की देन के बारे में बात करेंगे । यह बात तय है कि हम रचना के लिये कच्चा माल हमारे समाज से लेते हैं । इसलिये कि शब्द ,भाषा,अनुभव, और हमारे इर्द -गिर्द घटित होने वाला बहुत कुछ इसी समाज की ही उपज है । आप सोचकर देखिये यदि हमारे पास समाज के बीच बोली जाने वाली भाषा न हो , सामाजिक अनुभव न हों , सामाजिक विसंगतियों का ब्योरा न हो ,सामाजिक क्रियाकलापों की जानकारी न हो तो क्या हम कोई भी रचना लिख सकते हैं ? आप कहेंगे , निस्सन्देह हम अपने व्यक्तिगत अनुभवों को लेकर भी रचना लिख सकते हैं और इसमे ज़रूरी नहीं कि समाज का कोई योगदान हो । प्रश्न यह है कि जिसे आप व्यक्तिगत कहते हैं उसका समाज से क्या सम्बन्ध है । दरअसल हमारा व्यक्तित्व ही इस समाज की देन है ।हमारा व्यक्तिगत अनुभव के रूप में जो कुछ हमारे अवचेतन में दर्ज होता है वह वस्तुतः इस समाज के सामूहिक अवचेतन का ही परिणाम है ।

❇ भाषा - रचना के निर्माण के लिए दूसरा महत्वपूर्ण स्त्रोत है  भाषा। हम इस बात से इनकार नहीं कर सकते  कि यह भाषा या यह दृष्टि जिसका उपयोग हम अपनी रचना में कर रहे है वह हमने इस समाज से ही ली है । अपनी मातृभाषा को ही ले लें । यदि हमारे माता-पिता या समाज हमें यह भाषा सीखने का अवसर नहीं देता तो क्या इसमें या किसी भी भाषा में रचना सम्भव थी ? इसके लिये हमारे पास भाषा के इतिहास के बारे में ज़रूरी सूचनायें होना आवश्यक है और वह यह कि आदिम मनुष्य के पास जब कोई भाषा नहीं थी उसने संकेतों से अपने आप को किस तरह अभिव्यक्त करना प्रारम्भ किया । संकट के अलावा ,अपनी प्राकृतिक आवश्यकताओं के लिये भी उसने संकेतों का इस्तेमाल कैसे किया । बहरहाल जब हम भाषा लेते हैं तो भाषा के साथ उसके संस्कार भी ग्रहण करते हैं , भाषा में प्रचलित लोकोक्तियाँ , कहावतें और मुहावरे भी लेते हैं ।

✳ चिंतन  - एक प्रश्न यह भी उठता है कि हम चिंतन किस भाषा में करते हैं । सामान्यतः एक रचनाकार भी अपनी मातृभाषा में ही चिंतन करता है लेकिन कुछ ऐसे रचनाकार भी होते हैं जो अन्य किसी भाषा में इतने सिद्धहस्त हो जाते हैं उनकी चिंतन की भाषा भी वही हो जाती है । अंग्रेजी के ऐसे बहुत से लेखक हैं जिनकी मातृभाषा तो हिंदी है लेकिन वे चिंतन अंग्रेजी में करते हैं इसका अर्थ यह है कि उनके रचना के स्त्रोत भी बढ़ जाते हैं जिनमे मुख्य भूमिका पुस्तकों की होती है ।

✳ स्मृतियाँ - रचना के लिये कच्चे माल के रूप में सर्वाधिक भंडार हमें अपनी स्मृतियों से प्राप्त होता है
 । होश सम्भालने की उम्र से लेकर वर्तमान आयु तक बिताए  हुए जीवन के बहुत से सुखद व दुखद क्षणों की स्मृति हमारे साथ होती है । इसमें बचपन की स्मृति प्रमुख होती है । आपने देखा होगा कई बुज़ुर्गों को जब वे अपने बचपन की घटनाओं को बताते हैं तब वे सिलसिलेवार एक एक बात रखते हैं । यहाँ तक कि किसी विशिष्ट दिन और और किसी विशिष्ट अवसर पर उन्होंने  क्या पहना था या क्या खाया था यह भी वे विस्तार से बताते हैं । जबकि कई बार कुछ देर पहले की घटना भी उन्हें याद नहीं रहती ।
रचनाकार जब लिखना प्रारम्भ करते  हैं तो उनमें से कई लोग पहले पहल अपने बचपन की स्मृतियों के आधार पर ही रचना प्रारम्भ करते हैं । कई बार कुछ बड़े होने की स्थिति में प्राप्त अनुभव काम में आते हैं । किसी व्यक्ति से मुलाकात , बचपन का कोई दृश्य . किसी का प्रभाव यह सब हम अपने लेखन में इस्तेमाल करते हैं ।

❇ अतीत -साहित्य जगत में नॉस्टेल्जिया  शब्द को बहुत सम्मान के साथ  नहीं देखा जाता । ऐसा माना जाता है कि अतीत के लिये विलाप करना मूर्खता है । विलाप सचमुच मूर्खता हो सकती  है । अतीत जीविता अच्छी बात नहीं है लेकिन कई बार यह अतीत हमारी ताकत भी बन जाता है । अक्सर कोई गन्ध , किसी पुराने गीत की कोई पंक्ति , कोई जानी पहचानी आवाज़ , कोई तस्वीर , हमे अतीत में ले जाती है । जब हम अपने अतीत को याद करते हैं तो उससे जुड़े हुए दृश्य भी याद करते हैं । कई बार ऐसा होता है कि हमने अतीत में जो दुख भोगा है वह भविष्य में जाकर हमे सुख की तरह लगता है । हमने कई लोगों को देखते हैं जब भी वे अपने गर्दिश के दिनो की याद करते हैं तो एक अतिरिक्त उत्साह से भरे होते हैं । ऐसा सभी के साथ होता है लेकिन एक रचनाकार इनका उपयोग करता है ।

❇ अनुभव - एक रचनाकार इस बात को स्वीकार करता है कि अधिकांश स्त्रोत सामग्री उसे अपने अनुभवों  से प्राप्त होती है यही अनुभव उसकी स्मृति में दर्ज होते हैं । लेकिन कई बार अपने अनुभवों के अलावा दूसरों के अनुभव भी रचना के निर्माण में काम आते हैं यह रचनाकार की क्षमता पर निर्भर होता है कि वह दूसरों के अनुभव को किस तरह अपनी स्त्रोत सामग्री के रूप में इस्तेमाल कर सकता है । मैंने अपने कई मित्रों से पूछा है कि आप जब प्रेम कविता लिखते हैं तो उसके लिए कच्चा माल कहाँ से लेते हैं , क्या आपने स्वयं प्रेम किया है अथवा आप दूसरों के प्रेम के आधार पर कविता लिख रहे हैं । अधिकांश ने यह स्वीकार किया है कि वे स्वयं के प्रेम के अनुभव के आधार पर ही प्रेम कविता लिखते हैं कुछ ने यह भी कहा कि इसके पीछे उनके स्वयं के कम तथा औरों के अनुभव अधिक होते हैं ।

❇ किताबें - अंतिम बात यह कि एक रचनाकार के लिए किताबें भी बहुत महत्वपूर्ण स्त्रोत हैं । किताबों में ज्ञान का भण्डार है । किताबों में जो लिखा होता है वह इस मानवजाति का अनुभव ही होता है जिसे एक सार के रूप में लेखक प्रस्तुत करता है । किताबों में अथाह ज्ञान है लेकिन हमें यह तय करना होगा कि कौनसी पुस्तकें हम पढ़ें और कौनसी न पढ़ें । अनुभव प्राप्त करने के लिए कचरा पढ़ना आवश्यक नहीं है । पुस्तकों को भी हम अलग अलग श्रेणियों में विभाजित कर सकते हैं । बहुत सी पुस्तकें तथ्यात्मक जानकारी के लिए पढ़ी जा सकती हैं ।इस तरह हम विभिन्न स्त्रोतों से सामग्री लेकर रचना का निर्माण करते हैं ।

शरद कोकास

सोमवार, 29 अगस्त 2011

आज ब्लॉग विवरण में डॉ.कमला प्रसाद का नाम जोड़ा है

आज बहुत भारी मन से मैंने ब्लॉग विवरण में दिवंगत आलोचकों की सूची में डॉ.कमला प्रसाद का नाम जोड़ा है । और यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ उनपर लिखा एक लेख जो विगत 1 मई को अशोक सिंघई द्वारा कमला जी पर प्रकाशित एक स्मारिका के लिये मैंने लिखा था

साहित्य में अनुशासन के सिपाही – डॉ कमला प्रसाद
                                                         


डॉ कमला प्रसाद यह नाम सम्पादक सापेक्ष महावीर अग्रवाल के मुँह से पहली बार सुना । उन दिनों मैं दुर्ग - भिलाई में नया नया आया था । महावीर जी और मुकुन्द कौशल इस बात से वाकिफ़ थे कि मैं कवितायें लिखता हूँ । एक दिन महावीर जी ने पूछा  “ दस दिनों के लिये जबलपुर जाना चाहोगे  ? “ “ क्यों ? “ मैंने प्रतिप्रश्न किया । “  वे बोले …“ जबलपुर में कल से मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन का एक कविता  रचना शिविर प्रारंभ  हो रहा है । इस शिविर में तुम दस दिनों में कविता के बारे में इतना जान लोगे जो अगले दस साल में भी नहीं जान पाओगे । “ मेरे हाँ कहने पर महावीर जी ने कहा “ ठीक है , मैं तुम्हे डॉ कमला प्रसाद के नाम से एक पत्र देता हूँ , वे तुम्हारा नाम शिविर में शामिल कर लेंगे ।“
शाम की राज्य परिवहन की बस से मैं जबलपुर के लिये रवाना हो गया । सुबह सुबह अपना बैग लिये जब मैं बलदेवबाग स्थित जानकी रमण महाविद्यालय पहुँचा तो देखा एक ऊँचे पूरे सज्जन खाना पकाने वालों को कुछ सूचनायें दे रहे हैं । मैंने उन्हीं से कहा … “ मैं दुर्ग से आया हूँ । मुझे महावीर अग्रवाल जी ने भेजा है , मुझे कमला प्रसाद जी से मिलना है ।“ वे मुस्कुराये और कहा … आओ आओ , मैं ही हूँ कमला प्रसाद । ऐसा करो अपना सामान वहाँ हाल में रख दो और नहा कर नाश्ता करने आ जाओ । “
मैंने अपना सामान रखा । बाथरूम जाकर स्नान करने के उपरांत भोजन कक्ष में  आ गया । वहाँ उपस्थित तमाम चेहरे मेरे लिए नये थे । एक लड़के ने आकर मुझसे हाथ मिलाया और कहा … मैं सुरेश स्वप्निल हूँ भोपाल से और तुम …? मैंने कहा “ मैं शरद कोकास , दुर्ग से । नाश्ता चल ही रहा था कि देखा कमला जी व्याख्यान कक्ष से बाहर आ रहे हैं , चलिये आप लोगों ने अगर नाश्ता कर लिया हो तो गोष्ठी कक्ष में आ जाइये ।
हम लोग जैसे तैसे अपनी चाय समाप्त करके सभा कक्ष में पहुँचे । कमला जी माइक पर थे …” आज हमारे शिविर का दूसरा दिन है । विलम्ब से आने वालों को मैं यह सूचना देना चाहता हूँ कि इस कविता रचना शिविर का उद्घाटन कल श्री अशोक बाजपेयी द्वारा श्री हरिशंकर परसाई की अध्यक्षता में सम्पन्न हुआ । इस शिविर को मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष श्री मयाराम सुरजन ने भी सम्बोधित किया । यद्यपि विधिवत इस शिविर का प्रारम्भ आज से ही हो रहा है और  गोष्ठियाँ भी  आज से ही प्रारम्भ हो रही हैं इसलिये मैं सभी शिविरार्थियों को कुछ सूचनायें देना चाहूँगा । प्रतिदिन प्रात: साढे आठ बजे से गोष्ठियाँ प्रारम्भ होंगी जिनमें कविता की रचना प्रक्रिया , शिल्प , भाषा , सम्प्रेषणीयता , बिम्ब विधान , आदि विषयों पर दो वक्ताओं के व्याख्यान होंगे जिन पर प्रतिभागियों द्वारा चर्चा की जाएगी । दोपहर एक बजे भोजन के बाद दो बजे से द्वितीय सत्र प्रारम्भ होगा जिसके अन्तर्गत समूह चर्चा की जाएगी ।  शाम पाँच बजे चाय के उपरान्त  किसी एक विशिष्ठ कवि द्वारा कविता पाठ व उसकी रचना प्रक्रिया पर बात की जाएगी । रात्रि आठ बजे भोजन तथा भोजन के पश्चात समूह के अनुसार शिविरार्थियों की कविगोष्ठी । सभी कार्यक्रम समय पर सम्पन्न होंगे और किसी प्रकार की अनुशासन हीनता अक्षम्य होगी । “
मैं समझ गया , कमला प्रसाद जी को ‘ कमाण्डर ‘ क्यों कहा जाता है । शिविर का टाइम- टेबल देखकर बहुत सारे शिविरार्थियों की शहर घूमने या भेड़ाघाट जाने की योजना खटाई में पड़ चुकी थी । शाम को जब कमला जी से शिविरार्थियों ने जब यह आशंका प्रकट की तो उन्होंने कहा  “ घबराओ मत , एक दिन हम लोग भेड़ाघाट में ही गोष्ठी रख लेंगे । “ उस दिन प्रात:कालीन सत्र में मलय जी का व्याख्यान हुआ ‘ समाज में कविता और कविता का समाज ‘ इस विषय पर । सायंकालीन सत्र में भगवत रावत जी से कवितायें सुनी और उस पर बातचीत की । उस दिन का पूरा कार्यक्रम कमला जी के निर्देशानुसार ही सम्पन्न हुआ । मुझे तो इस बात की प्रसन्नता थी  कि इस शिविर में परसाई जी , हरि नारायण व्यास ,राजेश जोशी , धनन्जय वर्मा , सोमदत्त , प्रो श्यामसुन्दर मिश्र ,राजेन्द्र शर्मा ,पूर्णचन्द्र रथ जैसे कवियों और विद्वानों से मुलाकात होगी ।
पता नहीं क्यों मुझे उस दिन इस बात की गलत फ़हमी हुई कि कमला प्रसाद जी की भूमिका शिविर मे एक व्यवस्थापक की तरह ही है । मेरा यह भ्रम तब टूटा जब अगले ही दिन मैंने प्रात:कालीन सत्र में कमला जी को बोलते हुए सुना । वे अपनी व्यवस्थापक वाली भूमिका का निर्वाह कर एक आलोचक की भूमिका में आ गए थे । उस दिन ‘ परम्परा बोध और कविता ‘ इस विषय पर कमला जी का व्याख्यान सुनने को मिला । गोष्ठी के प्रारम्भ में उन्होंने अपनी सूचनाएं प्रेषित कीं , सत्र हेतु एक अध्यक्ष का चयन किया , एक शिविरार्थी को रिपोर्टिंग का काम सौंपा और विषय पर अपना व्याख्यान देना प्रारम्भ किया ।
“ प्रत्येक कवि के लिए परम्परा बोध इसलिये आवश्यक है कि वह वर्तमान को भलिभाँति समझ सके और भविष्य का मार्ग प्रशस्त कर सके । यह बोध लदे हुए आदर्शों के कारण आवश्यक नहीं है आवश्यक इसलिये है कि वह आज में घुसा हुआ है । हमारे मन में , हमारी चेतना में यह परम्परा भीतर तक धसी हुई है और वह प्रत्यक्ष दिखाई देती है । जिस प्रकार धरती के ऊपर की परत को जानने के लिए , उसकी संरचना को जानने के लिए उसकी भीतरी परतों को जानना आवश्यक है उसी तरह भीतर बसी हुई परम्पराओं को देखना भी आवश्यक है । “
कमला जी बहुत सरल शब्दों में शिविरार्थियों के सम्मुख अपने विचार रख रहे थे …”  एक समय इतिहास हन्ताओं का एक वर्ग सक्रिय था , परम्परा बोध की आवश्यकता उन्हें नहीं थी , वे ऐसा चाहते भी नहीं थे , लेकिन आज इसलिये है कि वर्तमान को देखने के लिए अतीत को समझना आवश्यक है । साहित्य एवं संस्कृति की परम्परा को देखें तो ज्ञात होगा कि ऐसे कितने ही रचनाकार थे जिन्होंने सामंतों के लिए लिखा , बाद के समय में अनेकों ने पूंजीपतियों के लिए लिखा लेकिन ऐसे बहुत कम थे जिन्होंने जनता के लिए लिखा । इस तरह हम रचनाकारों को चार किस्मों में विभाजित कर सकते हैं । पहले राजा स्वयं ,दूसरे उनके दरबारों में उनके संरक्षण में  रहकर लिखने वाले , तीसरे सबसे अलग रहकर कला में अपनी बात कहने वाले और चौथे जन के बीच रहकर लिखने वाले । “
इसी सत्र में “ साहित्य और विचारधारा इस विषय पर भी कमला प्रसाद जी के विचार सुनने को मिले । उन्होंने कहा “ विचार इतिहास की सृष्टि है । मनुष्य में प्रेम ,घृणा , भूख यह मूल राग होते हैं , यही कविता में भी विकसित होते हैं । यदि मनुष्य इन मूल रागों से भटकता है तो उसकी दोषी व्यवस्था होती है । मूल रागों से भटकने पर असंतोष बढ़ता है , फ़िर वह कृत्रिम शांति की तलाश में साधु संतों बाबाओं के पास जाता है । इसीलिये उसे सही विचारधारा की आवश्यकता होती है । कवि का यह कर्तव्य है कि वह स्वयं सही विचारधारा की तलाश करे और अपनी विचारधारा का उपयोग मनुष्य के मूल रागों की वापसी की ओर करे । “
कमला प्रसाद जी के विचारों को जानने का यह मेरा पहला अवसर था । फ़िर दस दिनों तक उनसे काफ़ी बातचीत हुई । वे ही अकेले एक ऐसे व्यक्ति थे जो भोजन कक्ष में , शयन कक्ष में लगातार शिविरार्थियों के साथ रहते थे । कमला जी से परिचय की यह शुरुआत थी । उस शिविर में मुझे यह भी ज्ञात हुआ कि दुर्ग- भिलाई के रचनाकारों से कमला जी का विशेष अनुराग है और यह मैंने उनके दुर्ग-भिलाई आगमन पर महसूस भी किया । उनका यह अनुराग कम तो कभी नहीं हुआ अपितु लगातार बढ़ता ही रहा । इस शिविर के दस वर्षों पश्चात जब अपना पहला कविता संग्रह प्रकाशित करने का विचार मन में आया तो उसकी भूमिका लिखने के लिये कमला जी के अलावा और किसी का नाम मेरे मन में नहीं आया , जबकि उन दिनों कवियों से ही ब्लर्ब और भूमिका लिखवाने की परम्परा थी । मित्रों ने कहा भी कि कमला जी आलोचक हैं और आलोचक का काम कविता संग्रह प्रकाशित होने के पश्चात प्रारम्भ होता है । मैंने किसी की कोई बात नहीं सुनी , कमला जी से साधिकार अनुरोध किया और पाण्डुलिपि उन्हे भेज दी । उन्होंने सहर्ष यह भूमिका लिख भेजी साथ ही अपने सुझाव भी दिये ।
भोपाल में उनसे मुलाकात के अलावा ,प्रगतिशील लेखक संघ के कार्यक्रमों में , हिन्दी साहित्य सम्मेलन के कार्यक्रमों में कमला जी जब भी दुर्ग भिलाई आये , उनसे बातचीत का अवसर मिलता रहा । संगठन के बारे में या लेखन के बारे में जब भी कोई कठिनाई मुझे महसूस होती मैं उन्हें पत्र लिख देता । उनके लिखे हुए बहुत सारे पोस्टकार्ड आज मेरी धरोहर हैं । जब भी मैं उनसे सम्वाद की आवश्यकता महसूस करता हूँ अपने संग्रह की भूमिका या उनकी चिठ्ठियाँ पढ़ लेता हूँ ।                                                                                                                     
                      n  शरद कोकास